प्राणीविज्ञान विभाग

विभाग का संक्षिप्त विवरण :

त्रिपुरा विश्वविद्यालय जब कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर केन्द्र के तौर पर कार्य कर रहा था, उन्हीं दिनों वर्ष 1980 में यहां जीवन विज्ञान विभाग की स्थापना हुई और विभाग ने अपना गतिविधियाँ प्रारंभ की। प्रारंभ काल से ही जीवन विज्ञान विभाग में स्नातकोत्तर तथा पीएच.डी. के पाठ्यक्रम संचालित किये जा रहे हैं। जीवन विज्ञान विभाग के शोधार्थी अपने विषय से संबंधित कई नए विषयों पर अपना शोध कार्य कर रहे हैं।

वर्ष 1987 में, कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर केन्द्र को त्रिपुरा विश्वविद्यालय के तौर पर परिणत कर दिया गया और इसके साथ ही दिनांक 12 जून, 2007 को प्राणीशास्त्र विभाग की स्थापना हुई और जीवन विज्ञान विभाग अपने तीन जीवन-विज्ञान विभाग की शाखाओं में बंट गया, जिनमें प्राणीशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र तथा शारीरिकी विज्ञान विभाग शामिल हैं।

प्राणीशास्त्र विभाग ने पहली बार त्रिपुरा राज्य में शोध अध्ययन के द्वारा कृत्रिम निषेचन तकनीकी से उच्च प्रोटीन युक्त ‘कैट फिश’ की प्रजाति ‘ओम्पुक बिमाकुलैटस’ को विकसित किया। यही तकनीकी चिताला मछली के विकास पर भी अपनायी गयी। इसके साथ ही विभाग ने क्लैरियस बेट्रैकस के ट्रिप्लॉड फॉर्म की पहचान की, जो कि समग्र तौर पर पूर्वोत्तर में और खासतौर पर त्रिपुरा में पहली बार संभव हुआ था। इसके साथ ही विभाग द्वारा पाब्दा प्रजाति के मछलियों, यथा – ओंपोक पाबदा तथा ओंपोक पाबो पर फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर तकनीकी से शोध श्रृंखला प्रारंभ की गई । त्रिपुरा के लॉटिक इकोसिस्टम को देखते हुए विभिन्न फ्रेशवाटर में विभिन्न प्रजातियों के जीव तथा समाप्ति के कगार पर पहुंच चुकी मछलियों की प्रजाति के साथ-साथ दुर्लभ प्रजाति की मछलियों पर विभाग द्वारा शोध कार्य प्रारंभ किया गया।

संप्रति, प्राणीशास्त्र विभाग, प्राणीशास्त्र के अध्यन-अध्यान में सक्रिय तौर पर जुटा हुआ है। इसके साथ ही, विभाग द्वारा प्राणीशास्त्र से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में प्री-डॉक्टोरल शोध कार्य प्रारंभ किए गए हैं। कैप्टिव ब्रीडिंग तकनीकी के माध्यम से विकसित हुए शोध क्षेत्र के अंतर्गत - मछलियों की समाप्त हो रही प्रजाति, खतरे में पड़ी प्रजाति, समाप्ति के कगार जा चुकी प्रजाति तथा दुर्लभ प्रजाति की मछलियों, पाबदा मछली की एक्वाकल्चर जैवतकनीकी, अंत:स्राव विज्ञान (इंडोक्राइनोलॉजी), अर्थवर्म बायोलॉजी तथा इकोलॉजी जैसे क्षेत्र समाहित हैं। संप्रति, विभाग द्वारा मत्स्य तकनीकी, अंत:स्राव विज्ञान (इंडोक्राइनोलॉजी) आदि जैसे क्षेत्रों में शोध कार्य संचालित किये जा रहे हैं। विभाग के पास सोफिस्टिकेटेड ट्राइनोकुलर माइक्रोस्कोप, इलेक्ट्रोफोरेटिक सिस्टम, गैस क्रोमैटोग्राफी, पीसीआर सिस्टम, लायोफिलाइजर तथा फ्रैक्शन कलेक्टर आदि सुविधाएं मौजूद हैं।

सामान्यतौर पर विभाग में एम.एससी. में प्रवेश क्षमता 30 छात्रों की है तथा पीएच.डी. में यह संख्या साल-दर-साल रिक्तता के आधार पर बदलती रहती हैं। पीएच.डी. में नामांकन के लिए विभाग द्वारा रेट परीक्षा आयोजित की जाती हैं।

संप्रति, विभाग प्राणीशास्त्र से संबंधित विभिन्न क्षेत्रों में अपने शोध कार्य को विस्तार देने पर लगा हुआ है। प्राणीशास्त्र के क्षेत्र में उच्च गुणात्मक शोध कार्य को समुन्नत बनाने हेतु विभाग को विभिन्न फंडिंग एजेंसियों द्वारा वित्तीय सहयोग प्राप्त हो रहा है जिनमें - डीबीटी, डीएसटी, सीएसआईआर आदि कुछ प्रमुख संस्थान शामिल हैं।

स्थापना वर्ष:

2007

विभागाध्यक्ष:

डा. शिवशंकर सिंह

 

 

कुल विजिटर्स की संख्या : 4929054

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अंतिम अद्यतनीकरण : 28/05/2024 02:03:20

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